नागरिक स्वतंत्रता बनाम पुलिस की अराजकता : उत्तराखंड उच्च न्यायालय का शानदार निर्णय

ऐसे समय में जब एक के बाद एक संस्थाओं को घुटने के बल बैठा दिया गया है। अनेक संस्थाएं तो ख़ुशी से रेंगने भी लगी हैं। ऐसे समय में जब भारत के सुप्रीम कोर्ट के पास जंतर मंतर पर युवाओं पर हुए लाठी चार्ज की सुनवाई करने का समय नहीं है। ऐसे बुरे वक्त में उत्तराखंड हाई कोर्ट का एक फैसला, भारत के संविधान की ताकत में मेरे जैसे अनेक नागरिकों के भरोसे को और भी मजबूत करता है।

पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गये एक व्यक्ति के मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस मैथानी ने उत्तराखंड पुलिस से पूछा कि क्या पुलिस गुन्डों का गिरोह है? हाई कोर्ट ने उत्तराखंड पुलिस से पूछा की किसी भी व्यक्ति को भारत में कहीं भी आने जाने से रोकने का उसके पास कौन सा क़ानूनी आधार है?

हाई कोर्ट ने पुलिस से कहा कि उसने जो कुछ भी किया है वह सरासर गुंडागर्दी है।

मामला यह है कि 19 जुलाई को उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी, दिल्ली के जन्तर मंतर पर कोकरोच जनता पार्टी के नेतृत्त्व में चल रहे आन्दोलन में शामिल होने के लिए जाने हेतु ट्रेन के इंतजार में ऋषिकेश स्टेशन पर ट्रेन में बैठे थे। उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें वहां से ही उठा लिया और जगह-जगह घुमाते रहे पार्टी के सचिव और उनकी पत्नी के द्वारा बार-बार पूछे जाने के बाद भी पुलिस ने उन्हें यह नहीं बताया कि उन्हें कहाँ ले जाया गया है। आम भाषा में खा जाये तो पुलिस ने प्रभात ध्यानी का अपहरण कर लिया था क्योंकि ऐसा तो अपहरण करने वाला गिरोह ही करता है कि किसी व्यक्ति को बिना अधिकार के उठा ले और बताये भी नहीं कि उसे कहाँ ले जाया गया है।

तब उत्तराखंड परवर्तन पार्टी के सचिव लाल मणि ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की। जिसके द्वारा यह अपील की गयी कि कोर्ट पुलिस को आदेश दे कि वह प्रभात ध्यानी को कोर्ट में लाये।

कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि क्या उसका काम सरकार की छवि को बचाना है? या उसका काम कानून के अनुकूल काम करना है? कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि “इस देश में आप क्या कर रहे हैं? क्या पुलिस का काम सरकार की छवि बचाना है या नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना? जिस तरह पुलिस व्यवहार कर रही है, वह बेहद बेतुका और अराजकता जैसा है।” कोर्ट ने पुलिस के व्यवहार को अराजक बताया।

कोर्ट ने कहा कि “हर नागरिक को देश में कहीं भी आने-जाने का अधिकार है। उन्हें रोकने वाले आप कौन होते हैं?” कोर्ट ने यह भी पूछा कि “क्या किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने जाना कोई संज्ञेय अपराध है?”

कोर्ट द्वारा राज्य सरकार के तर्कों का खंडन:

1.राज्य के वकील ने तर्क दिया कि दिल्ली में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144 सीआरपीसी) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। 

पीठ ने इसे खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि धारा 163 का उल्लंघन दिल्ली में होता, तो उस पर कार्रवाई का क्षेत्राधिकार दिल्ली पुलिस का था, उत्तराखंड पुलिस का नहीं।

2. राज्य पक्ष ने धारा 172 का हवाला देकर पुलिस अधिकारियों के निर्देशों के पालन की बात कही। पीठ ने पूछा कि प्रभात ध्यानी को कौन सा वैध पुलिस निर्देश जारी किया गया था और ट्रेन से उतारने का कानूनी आधार क्या था?

3. पुलिस की डेली डायरी (GD) की जाँच करने पर न्यायालय ने पाया कि उसमें लिखा था कि प्रदर्शन में भाग लेने से सरकार की छवि खराब हो सकती है। इस पर पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि क्या पुलिस का कर्तव्य सरकार की छवि चमकाना है?

4. वयस्क नागरिक की कस्टडी पर प्रश्नः राज्य ने बताया कि प्रभात ध्यानी को 24 घंटे के भीतर रिहा कर उनकी माता जी की सुपुर्दगी में दे दिया गया है। इस पर न्यायालय ने सवाल उठाया कि एक 62 वर्षीय वयस्क व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से रिहा करने के बजाय माता की कस्टडी में क्यों दिया गया?

न्यायालय द्वारा जारी निर्देश एवं आदेश:

1. जिस पुलिस अधिकारी ने प्रभात ध्यानी को ट्रेन से जबरन उतारा और हिरासत में रखा, उसे व्यक्तिगत रूप से मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया गया।

2. राज्य के पुलिस महानिदेशक, देहरादून व नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, संबंधित थानाध्यक्ष एवं जीआरपी को नोटिस जारी कर लिखित जवाब माँगा गया।

3. राज्य सरकार को यह स्पष्ट करने का आदेश दिया गया कि किस विशिष्ट कानून व अधिकार के तहत एक नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन किया गया।

उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह फैसला नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19 और 21) तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस का मूल कर्तव्य संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि सरकार की छवि चमकाना या कानून से परे जाकर अराजक तरीके से काम करना। पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पक्षकार बनाना और पुलिस महानिदेशक व अन्य उच्च अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करना यह संदेश देता है कि गैर-कानूनी हिरासत और शक्तियों के दुरुपयोग के खिलाफ न्यायपालिका पूरी दृढ़ता से खड़ी है। 

अब यह भी समझ लेते हैं कि इस घटना और अदालती कार्यवाही से हमें क्या शिक्षा मिलती है। हाई कोर्ट के इस आदेश से हमारी नागरिक चेतना को कौन सा लाभ मिल सकता है? 

हाई कोर्ट के इस आदेश से मिलने वाली पहली शिक्षा का सम्बन्ध संवैधानिक एवं नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता से है।विद्यार्थियों और नागरिकों को भारतीय संविधान द्वारा मिले मौलिक अधिकारों के बारे में व्यावहारिक ज्ञान मिलता है। विशेषरूप से अनुच्छेद 19 यानि, देश में कहीं भी आने-जाने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता, तथा अनुच्छेद 21, दैहिक स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार के बारे में ।

हाई कोर्ट के आदेश के शैक्षिक निहितार्थ 

यह मामला ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ जैसी संवैधानिक याचिकाओं के व्यावहारिक उपयोग को सिखाता है कि किस प्रकार अवैध हिरासत के खिलाफ नागरिक सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

इस आदेश से हमें पुलिस एवं प्रशासन की संवैधानिक सीमाओं के बारे में भी पता चलता है। शिक्षा प्रणाली में यह सिखाना आवश्यक है कि राज्य की एजेंसियों (पुलिस) का काम ‘कानून का शासन’ स्थापित करना है, न कि सत्ताधारी वर्ग की छवि बचाना। पुलिस को संविधान के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। प्रभात ध्यानी के मामले में उत्तराखंड पुलिस ने अपनी जनरल डायरी में लिखा था कि उनको जन्तर मंतर जाने से इसलिए रोका गया था क्योंकि उनके वहां जाने से राज्य की छवि खराब होती I

वास्तव में तो राज्य की छवि, पुलिस द्वारा “गुंडागर्दी” करने और “अराजक” तरीके से काम करने के कारण खराब होती है I राज्य की छवि, पुलिस के पार्टी कार्यकर्त्ता में बदल जाने के कारण खराब होती है I राज्य की छवि, नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के कारण खराब नहीं होती I   

नागरिक के तौर पर हमारी समझ को बढ़ाने में भी यह केस हमारी मदद करता है। क्योंकि यह मामला कानूनी प्रक्रियाओं और क्षेत्राधिकार के नियमों के बारे में हमारी समझ को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए किसी दूसरे राज्य में लागू किसी क़ानूनी धारा (बीएनएसएस धारा 163/सीआरपीसी 144) का हवाला देकर, किसी अन्य राज्य की पुलिस बिना कानूनी आधार के कार्यवाही नहीं कर सकती। उत्तराखंड राज्य ने कोर्ट में कहा कि प्रभात ध्यानी को इसलिए रोका गया था क्योंकि दिल्ली के जंतर मंतर में धारा 163 लगी हुई थी I सवाल यह है कि धारा दिल्ली में लगी है I क्या दिल्ली, उत्तराखंड पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आती है? 

नहीं आती I इसलिए उत्तराखंड पुलिस द्वारा प्रभात ध्यानी को हिरासत में लेना गुंडागर्दी श्रेणी में आता है I

उत्तराखंड के कुछ लोगों को लगता है कि उत्तराखंड में, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मुसलमानों के बुनियादी हकों को कमजोर और सीमित करने में लगे हुए हैंI इससे उन लोगों को ख़ुशी मिलती होगी! लेकिन प्रभात ध्यानी तो उत्तराखंड के हिन्दू हैं, और वह भी ब्राह्मणI फिर क्यों प्रभात ध्यानी को दिल्ली जाने से रोका गया? क्योंकि जब कोई राज्य और उसका प्रशासन धर्म या किसी अन्य बहाने से निरंकुश होता है तब उसकी गुंडागर्दी से कोई नहीं बच पाता I क्योंकि तब गुंडागर्दी करना राज्य आदत बन जाती है। 

(बीरेंद्र सिंह रावत की टिप्पणी। रावत दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध थे।)

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